
जीवन को जीने योग्य बनाने वाली कला और ज्ञान ही संस्कृति है। इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य मानव-कल्याण है। आहार आवास और सुरक्षा के अतिरिक्त मानव को अनेक आंतरिक और आत्मिक वस्तुओं की भी जरूरत का अनुभव होता है जीवन संघर्ष में सफलता के लिए इन सभी का होना अनिवार्य होता है। इसीलिए संस्कृति मानव-समूह की समस्त गतिविधियों को स्वयं में समाये रहती है जिनका विकास विभिन्न भौतिक परिवेशों के कारण होता है। यह एक सामाजिक भाव होता है जो निरंतर विकासशील रहता है। ये मानव के आचरण पर आधारित मूल्यो और आदर्शों का समूह है। जिसका एक मात्र उद्देश्य मानव-कल्याण है।
भारतीय संस्कृति की विकास प्रक्रिया बहुत लम्बी है। भारतीय इतिहास-भूगोल, प्राचीन सभ्यता, वैदिक युग,बौद्ध धर्म आदि अनेक तत्वों और तथ्यों से भारतीय संस्कृति का निर्माण और विकास हुआ है। भारत के रीति-रिवाज, भाषाएं, विभिन्न धार्मिक प्रणालियां यहां तक कि पड़ोसी देशों की सामाजिक धार्मिक परम्पराओं, प्रथाओं तथा अपनी परम्पराओं के पारस्परिक संबंधों का मिश्रण भारतीय संस्कृति के रूप में प्रकट हुआ है और निरंतर विकसित होता रहा है। इन सभी विभिन्नताओं और विविधताओं को आत्मसात कर जो अद्वितीय स्वरूप उभरा है वही भारतीय संस्कृति है।
प्रत्येक देश की संस्कृति के मूल में निश्चय ही उस देश की भाषा, धर्म, समाज और उसकी परम्पराएं, आस्थाएं तथा विश्वास आदि तत्व तो मुख्य हैं ही साथ ही भोजन, वस्त्र, साहित्य, इतिहास कला, संगीत, नृत्य नाटक, चित्रकारी, वास्तुकला, खेल और मनोरंजन आदि भी महत्वपूर्ण तत्व है। उस देश का दर्शनशास्त्र और दार्शनिकों का देय भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। इन सभी घटकों से मिलकर ही संस्कृति का निर्माण होता है।
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। अमरता इसकी अन्यतम विशेषता है। विश्व की अनेक संस्कृतियां कालांतर में लुप्त हो गई पर भारतीय संस्कृति विनाश के भीषण थपेड़ों को हजारों वर्षों तक सहकर भी आज जीवित है। भारतीय संस्कृति अपने अनूठे और विशिष्ठ गुणों के कारण आज जगत गुरू है। भारत से बाहर कितनी ही जातियों-धर्मो और समुदायों को हमारी संस्कृति ने सभ्य बनाया है। सर्वांगीणता, उदारता और सहिष्णुता भारतीय संस्कृति के अमोघ तत्व हैं।
आर्य भाषाओ, द्रविड़ भाषाओं का एक विशाल-भाषा परिवार है। इन्हीं दो परिवारों में भारत में बोली जाने वाली 415 भाषाएं सम्मलित हैं।
भारतीय धर्म परम्परा भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। भारत में हिन्दु, बौद्ध, जैन, सिक्ख, ईसाई धर्म समभाव से पल्लवित होते हैं। धार्मिक विभिन्नता भारतीय संस्कृति की अन्यतम विशेषता है। हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म क्रमशः विश्व के तीसरे और चौथे सबसे बड़े धर्म हैं।
भारतीय समाज भी संस्कृति का एक विशेष पक्ष है। प्राय: भारतीय पारम्परिक संस्कृति को कठोर सामाजिक परम्पराओं वाला माना गया है। एकल परिवार व्यवस्था भारतीय संस्कृति का आधार है। यहां पारिवारिक सम्बन्धों का प्रसार बहुत दूर तक फैला होता है। सम्मलित परिवार व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों में अब तक की विशेष बनी हुई है। जाति व्यवस्था भी यहां के समाज की विशेषता है जो पहले कठोर थी अब लचीली है। समाज अनेक जातियों और उपजातियों में बंटा है।
भारतीय संस्कृति एक बहु-सांस्कृतिक और बहु-धार्मिक समाज होने के कारण त्यौहारों और उत्सवों की संस्कृति कहलाती है। कुछ त्यौहार धर्म विशेष और जाति विशेष से भले ही अनुशासित हों पर प्रायः शेष सभी त्यौहारों जैसे होली,दीपावली, दशहरा, बुद्ध पूर्णिमा, बैसारखी आदि जैसे त्यौहार हैं जिन्हें प्राय: सभी भारतीय मनाते हैं। अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति का एक विशेष गुण है। पारम्परिक भारतीय भोजन प्रायः शाकाहारी है तथा इस समाज के अनेक वर्ग मांसाहारी भोजन भी करते हैं। वास्तव में विविधता भारत के भूगोल, संस्कृति और भोजन तथा वेशभूषा की एक पारिभाषिक विशेषता है। भारतीय पोशाकों की विविधता बड़ी अनूठी है। भारत के प्रत्येक क्षेत्र की अलग-अलग वेशभूषा भारतीय संस्कृति का एक विशेष गुण है। खान-पान और वेशभूषा की विविधता भारतीय संस्कृति को अद्वितीय और अनुपम बना देती है।
भारत का साहित्य विश्व साहित्य के परिदृश्य में बहुत महत्वपूर्ण है। संस्कृत, तमिल, तेलुगू, पालि आदि
भाषाओं का साहित्य बेजोड़ है। वहीं क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य भी कम नहीं है। हिन्दी भाषा के साहित्य का विश्व साहित्य में विशिष्ठ स्थान है। विश्व के अनेक महाकाव्यों को रचने का श्रेय भारतीय भाषाओं को ही है।
भारतीय संगीत बेजोड़ है। राग-रागनियों में बंधा भारतीय शास्त्रीय संगीत भारतीय संस्कृति की विशेष
धरोहर है। हिन्दुस्तानी संगीत और कर्नाटक संगीत के घरानो का तो कहना ही क्या। विश्व को भारतीय संगीत से बहुत कुछ सीखना है। संगीत के साथ ही भारतीय नृत्य भी भारतीय संस्कृति का अटूट अंग है। लोक नृत्यों और शास्त्रीय नृत्यों की विविधता केवल भारतीय संस्कृति का विशिष्ठ तत्व है। भांगड़ा बिहु, छाऊ, घूमर,डांडियां, गरबा लावणी आदि लोक नृत्य भारतीय संस्कृति के विशिष्ठ तत्व हैं। वहीं भरतनाट्यम, कथककली, मोहनी अट्टम, कुच्चीपुड़ी, ओडिसी तथा 'कथक' जैसे शास्त्रीय नृत्यों की विभिन्नता केवल भारतीय संस्कृति का ही विशिष्ठि आभूषण है। प्राचीन भारत संस्कृत नाटक और थियेटर का अक्षुण भंडार था। केरल की'कुटियट्टम' सर्वाधिक प्राचीन नाट्य परम्परा है। भरतमुनि और भास जैसे नाटाचार्य भारतीय संस्कृति का गौरव हैं। वहीं कालिदास और शूद्रक जैसे नाट्य लेखक अन्य देशों में कहाँ हैं। भारत में 'नाटक' पर आज भी नये-नये प्रयोग हो रहे हैं। जो भारतीय संस्कृति के विकास का परिचायक भी है। भारतीय चित्रकला भी भारतीय संस्कृति का विशेष पक्ष है। भारतीय मंदिरों में चित्रित भितिचित्र भारतीय संस्कृति की अनुपम देन हैं। मधुबनी चित्रकला, मैसूर चित्रकला, राजपूत चित्रकला, तंजौर चित्रकला, मुगल चित्रकला आदि भारतीय संस्कृति के अद्भुत तत्व है।अजन्ता, एलोरा, एलिफेंटा और सित्तनवासल की गुफाओं की चित्रकला अनुपम उपलब्धियां हैं। राजा रवि वर्मा, नन्दलाल बोस, जैमिनी राय तथा बी. वेंकटप्पा जैसे चित्रकार अन्य किसी देश की संस्कृति में नहीं है। मूर्तिकला भी भारतीय संस्कृति का अटूट अंग है। वहीं वास्तुकला भी अद्भुत और महान है। भारतीय मंदिर और विशेष कर दक्षिण भारत के मंदिरों में पत्थरों को तराश कर जो कला निखारी है वह विश्व में बेजोड़ है।
भारतीय वास्तुकला भी बेजोड़ है। एक ओर खजुराहों के मंदिर हैं तो दूसरी ओर श्रीरंगम, सांची स्तूप, हेलिबिड,कोर्णाक, तंजोर आदि स्थापत्य के सुंदर स्वरूप है। वहीं लालकिला, ताजमहल, कुतुबमीनार, लोट्स टैम्पल और मीनाक्षी मंदिर जैसे अद्भुत भवन भारतीय संस्कृति के मेरूमणि हैं।
मनोरंजन के विभिन्न साधनों की भारतीय आद्यतन संस्कृति में प्रचुरता है। थियेटर, सिनेमा, रंगमंच,रेडियो, टेलीविजन आदि भारतीय संस्कृति के अटूट अंग है। भारतीय सिनेमा अब हॉलिवुड के बराबर के स्तर पर आ खड़ा है। यह एक सत्य है। खेल और प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में भारत कभी पीछे नहीं था। कब्बड़ी और मल्लयुद्ध जहां प्राचीन भारतीय संस्कृति के विशेष बिन्दु थे वहीं आज फुटबाल, क्रिकेट, टेनिस, बैडमिन्टन तथा मुक्केबाजी और मल्लयुद्ध आदि खेलों में भारत ने कीर्तिमान बनाये हैं। भारत दार्शनिकों की भी भूमि है, जहां वररूचि, चाणक्य जैसे दार्शनिक प्राचीन संस्कृति के विभूषण है तो आज सरदार वल्लभभाई पटेल (लोह पुरुष), भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव,झांसी की रानी, मंगल पांडे, विवेकानन्द जैसे दार्शिनिक भारतीय संस्कृति के आधार है। 'वसुधैव कुटुम्बम' की भावना भी भारतीय संस्कृति की ही देन है। भारतीय संस्कृति में जीवन मूल्यों का विशेष स्थान है। जीवन के चार पुरूषार्थो में भारतीय संस्कृति और जीवन के समस्त पक्ष समाहित हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की परिकल्पना केवल भारतीय संस्कृति की ही देन है। इनमें प्रथम तीन जहां साधन है वहां अन्तिम साध्य अर्थात् मोक्ष है। ऐसा दर्शन किसी अन्य संस्कृति में नहीं मिलता।
योग भारत की संस्कृति और विरासत से भी जुड़ा हुआ है।योग, आध्यात्मिक भारत को जानने और समझने का एक तरीका है। संस्कृत में, योग का अर्थ है “एकजुट होना”। योग स्वस्थ जीवन जीने के तरीके का वर्णन करता है। योग में ध्यान लगाने से मन अनुशासित होता है। योग से शरीर का उचित विकास होता है और यह सुदृढ़ होता है। योग के अनुसार, यह वास्तव में हमारे स्वास्थ्य पर अपना प्रभाव डालने वाला शरीर का तंत्रिका तंत्र है। तंत्रिका तंत्र दैनिक योग करने से शुद्ध (मजबूत) होता है और इस प्रकार योगा हमारे शरीर को स्वस्थ और मजबूत बनाता है|
इन सबसे ऊपर विश्व कल्याण और मानव मात्र का कल्याण ही भारतीय संस्कृति का लक्ष्य है।
written by:- yoga guru shiv
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